लाहौर में कृष्ण मंदिर और कट्टरपंथी

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में एक निर्माणाधीन कृष्ण मंदिर की नींव कट्टरपंथियों ने तोड़ दी। यह मंदिर सरकारी धन की मदद से राजधानी विकास प्राधिकरण बनवा रहा था। पिछले 3 साल से यह मसला लटका हुआ था। आधारशिला रखे जाने के कुछ दिन बाद ही कट्टरपंथियों ने पिछले हफ्ते इस मंदिर निर्माण के खिलाफ फतवा जारी किया था जिस पर से प्रधानमंत्री इमरान खान ने योजना की फंडिंग पर रोक लगा दी और इस्लामिक आईडियोलॉजी काउंसिल से सलाह करने के बाद इस बारे में आगे कोई फैसला लेने का तय किया गया। कहा गया कि इस योजना के धार्मिक पहलू को देखा जाएगा। एक कट्टरपंथी इस्लामिक राष्ट्र में इससे ज्यादा और उम्मीद भी क्या की जा सकती है कि वह अन्य किसी भी धर्म की सकारात्मक गतिविधि को भी इस्लाम विरोधी या इस्लाम के लिए खतरा मानता है। इस घटना का उल्लेख करने का मकसद साप्रदायिक भाव को उभारना कतई नहीं है। इस उल्लेख का मकसद यह बताना है कि एक पंथ निरपेक्ष राष्ट्र के सोच में और एक कट्टरपंथी इस्लामिक राष्ट्र के सोच में अंतर क्या होता है। पाकिस्तान में पिछले हफ्ते हुई इस घटना के संदर्भ में वर्ष 1992 की एक घटना की याद दिलाना प्रासंगिक होगा। तभी इस अंतर के बारे में कुछ स्पष्ट हो सकेगा। 1992 में भारत में इसी तरह कुछ कट्टरपंथी सोच के समर्थकों ने अयोध्या में स्थित बाबरी मस्जिद ढांचे को ढहा दिया था । ढांचा इसलिए कहा गया कि वहां दशकों से कोई नमाज नहीं हुई थी।भारत की इस घटना के प्रतिक्रिया स्वरूप पाकिस्तान में तत्काल ही करीब एक हजार से ज्यादा मंदिरों में तोड़फोड़ की गई थी और उन्हें क्षति पहुंचाई गई थी। पाकिस्तान में कृष्ण मंदिर की नींव तोड़े जाने की इस घटना के बाद भारत में किसी मस्जिद को या इस्लाम से जुड़े किसी अन्य स्थल को कोई क्षति नहीं पहुंचाई गई है। कट्टरपंथी सोच और पंथ निरपेक्ष सोच के बीच यही अन्तर होता है। यह देखा गया है कि बदले की भावना इस्लाम समर्थक अधिक प्रदर्शित करते हैं। दुनिया में कहीं भी इस्लामिक हितों पर आघात हो तो उसके विरोध में पाकिस्तान में प्रदर्शन और हिंसा जरूर होती है। किसी और धर्म के बारे में ऐसा कहना संभव नहीं है। बाबरी मस्जिद ढांचे को किसी मंदिर के साथ हुई तोड़फोड़ के जवाब में नहीं गिराया गया था।वहां विवाद का मूल मसला उस स्थल के आधिपत्य का था और मन्दिर-मस्जिद के बीच इस मसले का निराकरण हाल ही में भारत के उच्चतम न्यायालय ने कर दिया है। लेकिन कट्टरपंथी राष्ट्र में ऐसा नहीं होता है। इसलिए यह ध्यान रखा जाना जरूरी है कि किसी भी घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप, खास तौर पर धार्मिक दृष्टिकोण वाली किसी घटना के लिये, समान रूप से जवाब देना पंथनिरपेक्षता के दायरे में नहीं आता है। ऐसा केवल कट्टरपंथी सोच ही कर सकती है जिसके मूल में प्रमुख रूप से हिंसात्मक आचरण होता है। सारे झगड़े की जड़ यह आचरण ही होता है। फिर भी यह अपेक्षा भारत सरकार से की जा सकती है कि वह पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं के लिए बनाए जाने वाले इस कृष्ण मंदिर के स्थल पर हुई तोड़फोड़ की निंदा करे। वह पाकिस्तान सरकार से यह मांग भी करे कि दोषियों को सजा दी जाए और मंदिर निर्माण का रास्ता साफ किया जाए। हालांकि यह पाकिस्तान का आंतरिक मामला है जिसे बहुत सोच समझ कर हाथ में लेना होगा।

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