शशांक शर्मा
कोराना महामारी ने दुनिया भर में भय का ऐसा वातावरण बनाया है कि समाज
के सभी वर्ग इससे प्रभावित हैं । भारत में गरीब किसान और मजदूर इस संकटकाल में
सबसे अधिक प्रभावित हैं । परिवार की आजीविका के लिए अपने गांव और कस्बों से जो
मजदूर बड़े शहरों में गए थे, वे आज अपने घर लौट आए हैं । उनके पास कोई नियमित
काम नहीं है, इसलिए उनके परिवार की चिंता करना लोक कल्याणकारी सरकार की
चिंता स्वाभाविक है। लॉक डाउन की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न
योजना प्रारंभ की गई थी, जिसे नवंबर तक बढ़ाने की प्रधानमंत्री की घोषणा को
मंत्रिमंडल की स्वीकृति भी मिल चुकी है ।
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत देश भर में खाद्य सुरक्षा क़ानून
के अंतर्गत आने वाले 80 करोड़ लोगों को प्रति माह 5 किलो अनाज, गेहूं या चावल
निःशुल्क दिए जा रहे हैं, साथ में प्रति माह प्रति परिवार एक किलोग्राम चना भी दिया
जा रहा है । अप्रैल से जून के लिए केन्द्र सरकार ने 120 लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न सभी
राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों के लिए जारी किया था, जिसमें से 116 लाख टन अनाज
का उठाव कर 107 लाख टन से अधिक खाद्यान्न जनता में निःशुल्क वितरित किए जा
चुके हैं । अब इस योजना को नवंबर माह तक निरंतर जारी रखने का निर्णय लिया गया
है, जिस पर केन्द्र सरकार को 76 हज़ार करोड़ रुपए से अधिक की राशि का व्यय करना
होगा ।
देश पर कोई संकट हो, और इसका प्रभाव गरीब जनता पर पड़ रहा हो तो सरकार का संवैधानिक दायित्व भी है कि सबसे पहले गरीबों और वंचितों का ध्यान रखा जाए । संविधान के भाग चार राज्य के नीति निदेशक तत्व के अनुच्छेद 38 लोक कल्याण
की भावना से सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था बनाने का निर्देश शासन को देता है । यही भावना प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना की भी है । स्वतंत्रता के बाद भी दो वक़्त की रोटी की व्यवस्था स्थानीय स्तर पर न हो सके, यह देश के गौरव पर ठेस है। देश में
प्लेग फैल जाए, सुनामी या भूकंप आ जाए, या अभी कोरोना संकट में यही प्रवासी और अप्रवासी मजदूरों को विभीषिका भोगनी पड़ती है । देश भर से चार करोड़ मजदूरों काबड़े शहरों से अपने गांव या कस्बों में वापसी हुई है । कोरोना संकट का असर शहरों व क़स्बों में छोटा व्यवसाय करने वाले, सडकों पर ठेला-खोमचा लगाने वाले वर्गों पर भी पड़ा है, इसलिए इन वर्गों की सरकार और समाज चिंता करे, जरूरी भी है । हालात के मारे इन मजदूरों, छोटे व्यवसायियों, ठेले-खोमचे लगाने वालों को पेटभर भोजन मिल जाए, यह सरकार की प्राथमिकता है । संकट का दौर तो टल जाएगा लेकिन इस दौरान परिश्रम करने वालों के स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखा तो जीवन भर इसका दुष्परिणाम हो सकता है । परिवार को भर पेट भोजन न केवल शरीर का पोषण करता है, अपितु वह कमाई न कर पाने के मानसिक अवसाद को भी कम करता है । शहरों से गांव लौटने वालों को मनरेगा के जरिए रोजगार दिया जा रहा है, केन्द्र सरकार के कोरोना क़ालीन आर्थिक पैकेज में मनरेगा के लिए 60 हज़ार करोड़ रूपए का अतिरिक्त प्रावधान किया गया है। व्यक्ति जब अपने बच्चों और परिजनों के भूख की चिंता से मुक्त हो जाए तो वह ज़िन्दगी की नई पारी प्रारंभ करने के लिए भी उत्साहित रहता है । कोरोना संकट से समाज और अर्थव्यवस्था के लिए नए अवसर भी लेकर आया है। कृषि के प्रति दृष्टिकोण बदला है, वापस लौटे मजदूर अपने खेतों की ओर लौट रहे हैं । इस वर्ष खरीफ की बुवाई में गत वर्ष की अपेक्षा 88 प्रतिशत अधिक बुवाई का संपन्न हो जाना, इस तथ्य की पुष्टि करता गई । ऐसा हुआ तो कृषि पनपेगी और किसान भी खुशहाल होंगे । देश के प्रत्येक नागरिक को अपने घर के आस-पास रोजगार की सुविधा मिल जाए तो किसी भी संकटकाल में गरीबों को जिन समस्याओं से जूझना पड़ता है, उससे उनको मुक्ति मिलेगी, यह उद्देश्य आत्मनिर्भर भारत मिशन का है । बड़े शहरों से लौटे मजदूर अपने साथ उद्योग में काम करने का अनुभव और कौशल लेकर लौटे हैं । ऐसे कुशल कामगारों को आत्मनिर्भर भारत योजना के तहत कोई स्वरोजगार के साधन उपलब्ध हो जाए तो मजदूरों के पलायन की समस्या से मुक्ति मिलेगी । केन्द्र की नीति का फायदा लेना लोगों ने शुरू भी कर दिया है । हरियाणा के हरदोई में दो मजदूर भाईयों ने अपने स्वयं की बेकरी प्रारंभ कर उदाहरण पेश किया है । प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना केवल संकटकालीन खाद्यान्न वितरण का कार्य नहीं है, यह भूख से मुक्ति के साथ आत्मनिर्भरता की युक्ति है । यह कोरोना के बाद बदलने वाली वैश्विक सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था के लिए भारतीय चिंतन है, स्वरोजगार और स्वदेशी । देश का परिश्रमी वर्ग अगर ठान ले तो वह कल रोजगार मांगने वाला नहीं बल्कि देने वाले बनेंगे
