चीन कभी भी विश्वसनीय नहीं रहा है, हालांकि वह 2 किलोमीटर पीछे हट गया है और उसने गलवान से तंबू उखाड़ लिए हैं। भले ही इससे संकेत मिल रहा हो कि चीन डर गया है, तो भी भारत को किसी भी प्रकार की गफलत में नहीं रहना चाहिए। भारत को हर पल चौकन्ना और सतर्क रहना होगा तथा चीन की हर हरकत पर ध्यान भी रखना होगा ताकि भविष्य में कोई गलत ना हो पाए। हवाई निगरानी ना करने पर भी सहमति बन गई है और इस सब का श्रेय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को जाता है। उनकी कूटनीति आखिर रंग लाई। चीनी विदेश मंत्री से उनकी सीधी बात के बाद चीन ने पहली बार माना कि दोनों सेनाओं को पीछे हटाकर शांति की बात हो। लद्दाख सीमा पर चीनी सेना द्वारा किए गए संघर्ष पर भारतीय राजनीतिक नेतृत्व का रवैया अभी भी स्पष्ट नहीं है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लेह पहुंचे और अन्य कार्यक्रमों के साथ अस्पताल में भर्ती सैनिकों से भी मिले। इस मुलाकात का चित्र भी प्रकाशित हुआ है। जाहिर है यह चित्र सेना ने ही सरकार के माध्यम से जारी किया होगा। प्रधानमंत्री के और भी चित्र सामने आए हैं जिनमें वे सीमावर्ती क्षेत्र में तैनात सैनिकों के समूह को संबोधित कर रहे हैं। हो सकता है कि राजनीतिक नेतृत्व चीन के साथ सीमा विवाद को आम चर्चा का विषय नहीं बनाना चाहता हो। ऐसा कोई नियम भी नहीं है कि ऐसे विषय को आम चर्चा का विषय बनाया ही जाए। लेकिन आमतौर पर जब सीमा पर देश की सुरक्षा खतरे में पड़ती दिखाई दे रही हो तो देश के भीतर देश की अखंडता की रक्षा का भाव और देशभक्ति का जज्बा उभार लेता ही है। इसे बहुत स्वाभाविक माना जाता है और आमतौर पर सरकारें इसके पीछे खड़ी दिखाई देती हैं। संभवत यह पहला मौका है जब सीमा पर हुए गंभीर विवाद और उसके बाद तेजी से बढ़ते तनाव को लेकर सरकार और देश के बीच मतभेद दिखाई दे रहे हैं। सरकार किसी कब्जे से या भूमि छीने जाने से लगातार इन्कार कर रही है। उधर सीमा वार्ता में सेना का पक्ष इस बात का उल्लेख कर रहा है कि चीन ने भारत की तरफ अतिक्रमण किया है और सेनाएं आगे आई हैं। तकनीकी रूप से सेना का कथन अधिक सच माना जाता है। राजनीतिक नेतृत्व की अपनी मजबूरियां हो सकती हैं लेकिन सेना ऐसी किसी मजबूरी से अपना कथन नहीं बदलती है। वह जानकारी को जाहिर होने से रोक सकती है लेकिन जानकारी को बदलने की घटनाएं उसके इतिहास में कभी दर्ज नहीं हुई हैं। प्रधानमंत्री के दौरे में भी अस्वाभाविक कुछ नहीं था ना ही यह अभूतपूर्व था। पिछली बार चीन से हुई लड़ाई के वक्त भी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नेफा बॉर्डर पर गए थे और नेहरू ने भी सीमा पर तैनात सैनिकों से बात की थी, अस्पताल में भर्ती घायल जवानों से मुलाकात की थी और सेना के समूह को संबोधित किया था।लेकिन इस बार यह कारण अभी तक ना सरकार ने स्पष्ट किया है ना ही किसी की समझ में आया है कि लद्दाख में चीनी सेना से हुई झड़प और उसके बाद हो रही घटनाओं के बारे में सरकार देश को विश्वास में लेने से हिचकिचा क्यों रही है। बेहतर होता कि सरकार इस बारे में वजह बता देती कि वह अभी इस बारे में ज्यादा विस्तृत जानकारी नहीं दे सकती है। इससे भी देश में विश्वास कायम किया जा सकता है। हालांकि प्रधानमंत्री ने घटना के कई दिन बाद इस मसले का जिक्र तो किया लेकिन एक बार भी उन्होंने सीधे-सीधे ना तो चीन का नाम लिया है ना ही इस संघर्ष की विगत का कोई उल्लेख किया। इससे संदेह और बढ़ जाता है। और भी कुछ घटनाएं हुई हैं जैसे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और संयुक्त सैन्य कमान के प्रमुख जनरल बिपिन रावत लद्दाख सीमा का दौरा करने वाले थे लेकिन एनवक्त पर रक्षा मंत्री का दौरा कैंसिल हो गया और प्रधानमंत्री सीमा पर पहुंचे। घटनाक्रम में किसी नियम का उल्लंघन नहीं हुआ है लेकिन परंपराओं और पूर्व उदाहरणों का उल्लंघन जरूर हुआ है। कहना कठिन है कि इस संदेह को बने रहने देने में सरकार क्या लाभ देख रही है या उसकी क्या मजबूरियां हैं।
चीन नहीं है भरोसे लायक
