मध्यप्रदेश कांग्रेस ने मनाया काला दिवस

मध्यप्रदेश कांग्रेस ने 30 जून मंगलवार को पूरे प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के 100 दिन पूरे होने के अवसर पर काला दिवस मनाया तथा धरना देकर प्रदर्शन किया। कांग्रेस नेता और कार्यकर्ताओं ने कई जगह काले कपड़े पहन रखे थे और राजधानी भोपाल में काले गुब्बारे छोड़कर इस सरकार का विरोध किया। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया है कि 30 जून को प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के 100 दिन पूरे हो गए हैं तथा यह सरकार जनमत से चुनी हुई नहीं बल्कि खरीदी हुई, जुगाड़ वाली ”आऊटसोर्सÓÓ सरकार है। ये आरोप भी लगाये गये हैं कि यह किसान विरोधी, एक कमरे से चलने वाली, वीडियो कांफ्रेंस वाली, झूठ बोलने वाली, आधी अधूरी अवैधानिक सरकार है। जिसने अपने 100 काले दिनों में महामारी से जूझती जनता की सेवा नहीं की। उसने आटा के पैकेट से आटा चुराया, डाक्टरों के लिये अमानक पीपीई किटें खरीदीं, उत्तरप्रदेश के गरीबों का चुराया गेहूं खरीदा, निजी अस्पतालों मे जबरिया लोगों को भर्ती किया और सरकारी अस्पताल खाली रहे। कांग्रेस का यह भी आरोप है कि प्रदेश का 15 साल का पला-पुसा माफिया फिर सक्रिय हो गया है। तीन महीने में ही अमित शाह के झूठे फोनों से नियुक्तियां होने लगीं, मुख्यमंत्री की नकली नोटसीटें बनने लगीं हैं। इस अवधि में प्रदेश की जनता सरकार से परेशान हो चुकी है, उन्होंने कोरोना पर सरकार से श्वेतपत्र जारी करने की मांग की। प्रदेश की जनता सरकार बनने के 100 दिन बाद भी मंत्रिमंडल का इंतजार कर रही है। देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि 100 दिन की सरकार के बाद भी मंत्रिमंडल का ठीक से गठन तक नहीं हो सका है। उल्लेखनीय है कि शिवराज सरकार का दूसरा मंत्रिमंडल विस्तार 2 जुलाई को होने जा रहा है। यह आरोप भी लगाया गया है कि मुख्यमंत्री चौहान के 100 दिन के कार्यकाल में 70 प्रतिशत आईएएस और 50 प्रतिशत आईपीएस के ट्रांसफर किये गए हैं जो खुद में एक रिकार्ड है। कुल 227 आईएएस का ट्रांसफर किया गया है। इससे साफ है कि मुख्यमंत्री का सरकारी अधिकारियों पर से भरोसा पूरी तरह उठ गया है। जिन जिलों में कोरोना के कारण स्थिति गंभीर थी, वहां पर भी सरकार ट्रांसफर कर उद्योग चलाने में व्यस्त थी। यहाँ तक कि सरकार ने अनेक बार ट्रांसफर करके तुरंत कैंसिल भी किये जो बताता है कि सरकार के ट्रांसफर उद्योग को कोई पर्दे के पीछे से चला रहा है। कांग्रेस नेताओं ने दावा किया है कि कमलनाथ सरकार ने प्रथम चरण में 20.22 लाख किसानों का 7 हजार 137 करोड़ रूपये का कर्ज माफ किया है। इनमें 10 लाख 30 हजार एनपीए (कालालीत-डिफॉल्टर) 2 लाख तक का एवं 9 लाख 92 हजार किसानों के चालू खातों का 50 हजार तक का कर्ज माफ हुआ है। द्वितीय चरण में 1 लाख 87 हजार किसानों के चालू खातों के बारे में लगभग 2 हजार करोड़ के कर्ज माफी की स्वीकृति दे चुके थे, द्वितीय चरण में 6 लाख 61 हजार 347 किसानों का 4 हजार 456 करोड़ का कर्ज माफ करने की योजना थी। तृतीय चरण जिसमें 1 लाख से लेकर 2 लाख तक चालू खाताधारक किसानों को सम्मिलित करना था, जिसमें 4 लाख 80 हजार 897 किसानों के 6 हजार 836 करोड़ रूपये के ऋण माफी की योजना थी। कांग्रेस ने सरकार से पेट्रोल डीजल की बढ़ी हुई कीमतें वापस लेने की भी मांग की। दूसरी ओर भाजपा 3 जुलाई को एक वर्चुअल रैली आयोजित कर 100 दिन की सरकार सरकार की उपलब्धियां गिनाएगी और कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के 15 माह के कार्यकाल पर आरोपों की झड़ी लगाएगी ।

बरसों से चल रही साठगांठ की जवाबदेही तय हो

मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में लंबे समय से आपराधिक गतिविधियां चल रही है और धीरे-धीरे जो तथ्य उजागर हो रहे हैं उसको देखते हुए अब पुलिस प्रशासन के उन लोगों की पहचान की जाना चाहिए जिनकी सांठगांठ से इस प्रकार की धंधेबाज लोग फल-फूल रहे हैं।मानव तस्करी, हनी ट्रैप और अन्य अपराधों के आरोप में गिरफ्तार एक आरोपी के मीडिया को दिये बयान के बाद उसके साथ तैनात दो सिपाहियों को तत्काल निलम्बित कर दिया गया है। लेकिन शहर में दशकों तक ये कथित अपराध चलते रहे, इसकी जवाबदेही तय नहीं की जाना अचरज पैदा करता है। गैर जवाबदेही के इस आरोप में जिला प्रशासन और पुलिस का कोई वरिष्ठ अधिकारी अभी तक निलम्बित नहीं हुआ है। यह एक मामला नहीं है जिसमें व्यवस्था पर नियंत्रण और निगरानी के लिये शहर में तैनात वरिष्ठ अधिकारी बचते रहे हैं। हाल ही में इंदौर में अरबों रुपए की कथित टैक्स चोरी के एक मामले का भी भंडाफोड़ हुआ है। दिल्ली से आए अधिकारियों के दल की इस कार्यवाही में शहर में अनेक स्थानों पर आरोपी के गोदाम और उत्पादन केंद्र पकड़े जा रहे हैं। माल का भारी स्टॉक पकड़ा जा रहा है। ट्रकों से भरकर माल परिवहन के सबूत मिल रहे हैं। यह पूछा जाना अस्वाभाविक नहीं है कि अवैध कारोबार का इतना बड़ा साम्राज्य शहर में फैलता रहा जिसकी खबर दिल्ली पहुँच गई लेकिन स्थानीय जिला प्रशासन और पुलिस को इसका पता नहीं चला! क्या यह संभव है कि शहर में इतने बड़े पैमाने पर, इतनी बड़ी अवैधानिक गतिविधि, इतने लम्बे समय से चल रही हो और जिले के जिम्मेदार अफसरों को उसकी भनक तक न लगे ? इलाके में सट्टे जुएं की भनक टी. आई. को न लगे तो उसे गैर जिम्मेदार और निकम्मा अफसर मानकर हटा दिया जाता है या निलंबित कर दिया जाता है। बिल्कुल वही उदाहरण शहर के स्तर पर जिला प्रशासन और पुलिस का यह है कि इतनी अवैध गतिविधियां शहर में इतने लंबे समय तक चलती रहीं और प्रशासन और पुलिस ने इसके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की ना ही उसे इसकी खबर तक लगी। यदि उसे खबर थी और फिर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई तो यह और भी अधिक गंभीर अपराध बनता है। पता नहीं राज्य शासन इस बारे में क्या सोचता है लेकिन प्राकृतिक न्याय की मांग है कि इंदौर जैसे व्यापारिक शहर में ऐसे अपराधों का इतने बड़े स्तर पर पनपते जाना और स्थानीय प्रशासन का चुप्पी साधे रहना अनुचित है। शासन यदि निष्पक्ष है तो इंदौर शहर में पिछले कुछ सालों में तैनात रहे वरिष्ठ अधिकारियों से पूछताछ कर उनके खिलाफ इस आरोप में कार्रवाई की जानी चाहिए कि वे इन अपराधों का पता क्यों नहीं लगा पाए और यदि लगा पाए तो उन्होंने इनके खिलाफ अभी तक कार्रवाई क्यों नहीं की थी। भू-माफियाओं को एक के बाद एक पकड़े जाने से जो एक आशा की किरण प्रशासन के बारे में उभर रही थी उसे इन बड़े प्रकरणों ने धूमिल कर दिया है। किसी भी शासन के लिये निष्पक्षता पर आंच आना या अन्याय का आरोप लगना गम्भीर मसला समझा जाना चाहिये। इंदौर शहर के हित में यह मांग की जाना सर्वथा उचित है कि यहां तैनात अधिकारियों से जवाबदेही की पूछताछ की जानी चाहिए और उसे आम जानकारी के लिए उजागर किया जाना चाहिए ताकि शहर का प्रशासन में विश्वास फिर से बहाल हो सके। निचले स्तर के दो सिपाहियों को एक ऐसे आरोप में निलंबित करना जिसका असर पूरे मामले पर नहीं पड़ता है और वरिष्ठ अधिकारियों को जिम्मेदारी नहीं निभाने के लिए बख्श देना जिसका असर पूरे मामले पर पड़ता है, न्याय की बात नहीं है। यह संदेश जाना जरुरी है कि शासन की निगाह में कर्तव्य परायणता समान रूप से देखी जाती है वरिष्ठता या कनिष्ठता के आधार पर नहीं।

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