0 अरुण पटेल
बिहार विधानसभा चुनाव तथा मध्य प्रदेश सहित राज्यों के विधानसभा उपचुनावों में कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद राष्ट्रीय नेतृत्व पर फिर सवाल उठने लगे हैं। इस बार शुरुआत करते हुए कांग्रेस नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने तीखा हमला किया है कि नेतृत्व ने पराजय को ही अपनी ‘नियति’ मान लिया है तथा पार्टी में राजनीतिक मुश्किलों का समाधान नहीं निकाला जा रहा है इसकी वजह से जनता कांग्रेस को प्रभावी विकल्प के रूप में नहीं देख रही है। पूर्व केंद्रीय मंत्री वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी चिदंबरम के पुत्र कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने भी ट्वीट कर कहा है कि यह समय पार्टी में आत्मनिरीक्षण, मंथन, चिंतन और कार्यवाही का है। कपिल सिब्बल ने 28 उपचुनावों के नतीजों की चर्चा की है इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रदेश में कांग्रेस की दिशा और दशा तथा भविष्य को कुछ बेहतर बनाने के लिए संगठन में आमूलचूल परिवर्तन किया जाएगा या फिर कुछ कॉस्मेटिक सर्जरी कर कांग्रेस की दिशा व दशा, ‘नियति’ के ऊपर छोड़ दी जाएगी।
कपिल सिब्बल ने जो कुछ कहा है वह उत्तर प्रदेश और बिहार तथा अन्य राज्यों के संदर्भ में सही हो सकता है लेकिन मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात और छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस एक-दूसरे का विकल्प बन चुके हैं और यहां पर किसी भी क्षेत्रीय दल या अन्य राष्ट्रीय दलों के लिए विकल्प बनने की कोई गुंजाइश नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उपचुनावों में पराजय की रिपोर्ट प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ से मांगी थी जो उन्हें सौंपी जा चुकी है। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह दिल्ली में ही हैं और हो सकता है कि भोपाल लौटने के बाद कमलनाथ संगठन में व्यापक फेरबदल के लिए कदम उठाएं।नए सिरे से सभी पदाधिकारियों को बदलना होगा तो फिर वह प्रदेश कांग्रेस कमेटी को भंग करने का ऐलान कर सकते हैं। इसलिए देखने वाली बात यही होगी कि किस प्रकार की सर्जरी होती है या किसी कमेटी का गठन कर मामले को कुछ समय के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। कांग्रेस में नई पीढ़ी को प्रदेश में कमान सौंपने का दबाव भी बनने लगा है। केवल शीर्ष स्तर पर चेहरों की अदला बदली से कोई खास फर्क पड़ने वाला नहीं है क्योंकि चुनाव जीतना या हारना तो असल में पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की मैदानी स्तर की सक्रियता से होता है। यदि इस उद्देश्य से सर्जरी करना है तो निचले स्तर से लेकर प्रदेश कांग्रेस तक नए ऊर्जावान पदाधिकारियों की खोज क्या नेतृत्व कर पाएगा। नेताओं की गणेश परिक्रमा करने वाले तथा जमीन से कटे यानी हवा-हवाई चेहरों के स्थान पर मैदानी पकड़ वाले लेकिन नेताओं के ड्राइंग रूम से कटे चेहरों को तरजीह मिल पाएगी या फिर से गुटीय, जातिगत तथा क्षेत्रीय संतुलन के नाम पर नेताओं की आंखों के तारे बन चुके चेहरे ही नवाजे जाएंगे। फिलहाल चुनावी पराजय के बाद राज्य में भी कांग्रेस में घमासान होने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष दोनों ही कमलनाथ हैं और वह सबसे वरिष्ठ नेता हैं इसलिए खुलकर सतह पर घमासान नजर ना आए लेकिन हाईकमान तक जानकारियां पहुंचाने का सिलसिला आरंभ हो गया है। जैसे संकेत मिल रहे हैं कि कमलनाथ को प्रदेश संगठन में फेरबदल करने के लिए फ्रीहैंड दे दिया गया है पर यह भी सही है कि सोनिया गांधी राज्य में उपचुनावों में पार्टी के प्रदर्शन से नाराज हैं। प्रदेश में पार्टी अब नगरीय निकाय, पंचायती राज संस्थाओं के होने वाले चुनावों पर फोकस किए हुए हैं इसलिए जिला और ब्लॉक स्तर पर संगठन को पहले उसे दुरुस्त किया जाए और एक प्रभावशाली मैदानी मजबूत पकड़ वाली प्रदेश कांग्रेस कमेटी का गठन किया जाए जो नए सिरे से पार्टी को मजबूती दे सके। इन प्रयासों से पार्टी को कितनी मजबूती मिलती है वह इस बात पर ही निर्भर करेगा कि किन चेहरों को अब पार्टी आगे करती है।
कमलनाथ की कार्यशैली पर भी अपरोक्ष रूप से टीका टिप्पणियां हो रही हैं लेकिन वह या तो इशारों-इशारों में या फिर दबे स्वरों में सामने आ रही है। महिला कांग्रेस युवा कांग्रेस और एनएसयूआई को भी नए मुखिया की दरकार है क्योंकि इन पदों पर जो पद आसीन है उन्हें काफी लंबा समय हो गया है हालांकि युवा कांग्रेस के अध्यक्ष कुणाल चौधरी और एनएसयूआई के अध्यक्ष विपिन वानखेड़े ने अपनी उपयोगिता भी सिद्ध की है। कुणाल चौधरी भाजपा के गढ़ कालापीपल में सेंध लगाने में 2018 में सफल रहे तो दूसरे प्रयास में विपिन वानखेड़े ने भाजपा के मजबूत गढ़ आगर में सेंध लगाकर उपचुनाव जीत लिया है। अब दोनों विधायक हैं इसलिए विधानसभा में युवा आकांक्षा गुंजायमान होती रहेगी। भाजपा नेता तो खुले तौर पर कहते थे कि उपचुनावों के नतीजों के बाद कमलनाथ प्रदेश छोड़कर दिल्ली चले जाएंगे लेकिन कांग्रेस के अंदर भी कुछ लोग यही आस लगाए बैठे थे उनको साफ-साफ कमलनाथ ने बता दिया है कि जो लोग यह कहते थे कि कमलनाथ प्रदेश छोड़कर चले जाएंगे वे सुन लें कि मैं जिंदगी भर कांग्रेसजनों के साथ मिलकर प्रदेशवासियों की सेवा करूंगा। हम अभी से 2023 के लिए संघर्ष शुरू करेंगे और वह चुनाव जमकर पूरी ताकत से लड़ेंगे। इस प्रकार कमलनाथ ने साफ कर दिया है कि वह इस हालत में कांग्रेस को छोड़कर पलायन करने वाले नहीं हैं और मैदान में डटे रहेंगे।
*और अंत में ……………*
प्रदेश के पूर्व मंत्री वरिष्ठ कांग्रेस नेता नरेंद्र नाहटा ने उपचुनावों में कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन के बारे में जो कुछ कहा है वह अपने आप में काफी हकीकत बयां कर रहा है अब बारी प्रादेशिक और राष्ट्रीय नेतृत्व की है जो उसमें छिपे संकेतों को पहचाने और समझ कर कदम उठाने का प्रयास करें। नाहटा ने कहा है कि कांग्रेस भाजपा की बी टीम बनकर काम कर रही है। नाहटा का कहना है कि हमारे पास वह संगठन है ही नहीं है जो भाजपा के संगठन का मुकाबला कर सके। हम हनुमान चालीसा पढ़ने लग गए लेकिन इसका कोई मतलब नहीं, जब तक कि प्रतिबद्ध कार्यकर्ता और संगठन नहीं होगा तब तक कुछ नहीं होगा। मौजूदा मोर्चा संगठन फर्जी है। अब देखने की बात यही होगी कि प्रदेश कांग्रेस संगठन में किसी प्रकार का बदला होता है या नहीं।
कांग्रेस की अंतर्कलह: प्रदेश में हो पाएगा संगठन में आमूलचूल बदलाव ?
