छत्तीसगढ़ में दशहरा

 

छत्तीगसगढ़ के प्राय: सभी रियासतों और जमीदारी में कोई न कोई देवी प्रतिष्ठित हैं तो उनकी कुलदेवी है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि देवियों की पूजा से राजा जहां शक्ति संपन्न होता था। वे अपनी मान्यता अनुसार देवी के नाम अपनी राजधानी का नामकरण किये हैं। चंद्रपुर की चंद्रसेनी देवी, दंतेवाड़ा की दंतेश्वरी देवी, सारंगढ़ की सारंगढ़हीन देवी और बिलासपुर की समलेश्वरी देवी आदि। छत्तीसगढ़ में प्रमुख रूप से महामाया और समलेश्वरी देवी प्रतिष्ठित है। वास्तव में ये दोनों देवी दो प्रमुख रियासत क्रमश: रत्नपुर और संबलपुर की कुलदेवी है। इसके अलावा यहां अनेक देवियां क्षेत्रियता का बोध कराती है, -सरगुजा की सरगुजहीन दाई, चंद्रपुर की चंद्रसेनी देवी, जशपुर की कालीमाई आदि। इन देवियों की विशेष पूजा-अर्चना और दशहरा मनाने की विशिष्ट परंपरा रही है जो आज काल कवलित होती जा रहीं है।
सक्ती रियासत
इतिहास के पन्नों को उलटने से पता चलता है कि हरि और गुजर दोनों भाई लकड़ी के तलवार से शिकार करते थे। लकड़ी के तलवार से ही वार से भैंस का सिर काटा डाला, राजा उनके शौर्य से प्रसन्न होकर घोषणा की कि तुम दोनों एक ऐसे क्षेत्र का विस्तार करो जो शक्ति का प्रतीक हो और जिसमें तुम दोनों जमींदार होगे, तब भाईयों ने एक ऐसा करतब दिखाया जो सबकों जो पुन: आश्चर्य में डाल दिया। उन्होंने राजा बहादुर से निवेदन किया कि हम दोनों सूर्योदय से सूर्यास्त तक पैदल जितनी भूमि नाप सकेंगे, हम उसी भूमि के अधिकारी होंगे। उनकी बात राजा ने मान ली। शर्त के मुताबिक हरि और गुजर दिन भर में 138 वर्ग मील का क्षेत्र पैदल चलकर तय किया और शौर्य के प्रतीक सक्ती रियासत की स्थापना की। रियासत बनने के बाद सक्ती जमींदारी में प्रजा बड़ी सुखी थी। आगे चलक र यहां के जमींदारी रूपनारायण सिंह क ो अंग्रेजों ने सन् 1892 में राजा बहादुर का सनद प्रदान किया। आज भी यहां दशहरा पर्व में देवी की पूजा-अर्चना और लकड़ी के तलवार की पूजा की जाती है।
सारंगढ़ में गढ़ भेदन
वर्तमान सारंगढ़ पूर्व में सारंगपुर कहलाता था। सारंग का शब्दिक अर्थ- बांस। अर्थात् यहां काल में प्राचीन काल में बांसों का विशाल जंगल था। श्री नरेन्द्रसाय को संबलपुर के राजा ने सैन्य सेवा के बदले सारंगढ़ परगना पुरस्कार में दिया था। आगे चलकर वे सारंगढ़ के जमींदार बने थे। राजा कल्याण 1736 से 1777 हुये जिन्हें मराठा शासक ने राजा क ी पदवी प्रदान की थी। राजा संग्रामसिंह 1830 से 1872 क ो अंग्रेजो ने फ्यूडेटरी चीफ बनाया था।
यहां के राजा की कुलदेवी सम्लाई देवी है, जो गिरे विलास पैलेस परिसर में प्रतिष्ठित है। समलेश्वरी देवी की स्थापना सन् 1692 में कीगयी थी। सारंगढ़ छत्तीसगढ़ का उडि़सा प्रांत से लगा सीमांत तहसील मुख्यालय है।
दशहरा में गढ़ भेदन की परंपरा यहां के मुख्य आकर्षक है। शिवरीनारायण रोड में नगर से 4 कि.मी. की दूरी पर पर खेलभाठा में चिकनी मिट्टी का उंचा टीला प्रतीकात्मक गढ़ बनाया जाता है, और उसके चारों ओर पानी भरा होता है। गढ़ के सामने राजा, उसके सामंत और अतिथियों के बैठने के लिए स्टेज बनाया जाता था, विभिन्न ग्रामों में दशहरा मनाने आये ग्रामीण जन पानी में भीगकर पुन: गढ़ में चढऩे के प्रयास में गढ़ में फिसलन हो जाता था। बहुत प्रयत्न के बाद ही कोई गढ़ के शिखर में पहुंच पाता था और विजय स्वरूप गढ़ की ध्वज को लाकर राजा को सौंपता था। करतल ध्वनि के बीच राजा उस विजयी प्रतियोगी को तिलक लगाकर नारियल और धोती देकर सम्मानित करते थे। फिर राजा की सवारी राजमहल में आकर दरबारेआम में बदल जाती थी जहां दशहरा मिलन होता था। यहां भी बांस के हथियारों की पूजा की जाती है।
चंद्रपुर में नवमीं को दशहरा
उडि़सा के संबलपुर रियासत के अंतर्गत चंद्रपुर एक छोटे जमींदारी थी। यहां की अधिष्ठात्री चंद्रोसेनी देवी है। इस मंदिर की स्थापना के बारे में एक किंवदंति प्रचलित है। जिसके अनुसार चंद्रसेनी देवी, सरगुजा की सरगुजहीन दाई और संबलपुर की समलेश्वरी देवी की छोटी बहन है। एक बार किसी बात को लेकर चंद्रसेनी देवी नाराज होकर सरगुजा को छोड़कर रायगढ़ आ जाती है।
सरगुजा रियासत
सरगुजा रियासत में दशहरा उत्सव सरगुजहीन और महामाया देवी की पूजा-अर्चना का पर्व होता है। अश्विन शुक्ल परवा के दिन महामाया देवी के मंदिर में कलश स्थापना का कार्य पूरा होता है। इसे पहली पूजा कहा जाता है। अष्टमी के दिन राजा की सवारी का विशाल जुलूस बलि पूजा के लिए नगर भ्रमण के बाद महामाया मंदिर पहुंचती थी। महामाया देवी को प्राचीन काल में नरबलि देने का उल्लेख तत्कालीन साहित्य में मिलता है। बाद में पशु बलि दी जाने लगी। इस दिन को महामार कहा जाता था। फिर दशहरा का राजा की सवारी पुन: देवी दर्शन कर नगर भ्रमण करती हुई राजमहन परिसर में पहुंचकर मिलन समारोह में परिवर्तित हो जाता था।
रत्नपुर जहां नरबलि दी जाती थी
रत्नपुर कलचुरी राजाओं की वैभवशाली राजधानी थी। रत्नपुर में महामाया देवी की मूर्ति को मराठा सैनिकों ने बंगाल अभियान से लौटते समय सरगुजा से लाकर प्रतिष्ठित किया था। राजा की सरगुजा में महामाया देवी की मूर्ति बहुत अच्छी लगी और वे उन्हें अपने साथ नागपुर ले जाना चाहते थे। इसी उद्देश्य से वे मूर्ति को वहां से उठाना चाहे लेकिन मूर्ति टस से मस नहीं हुई। हारकर राजा देवी के सिर को ही काटकर अपने साथ ले आये लेकिन े रत्नपुर से आगे नहीं ले जा सके और रत्नपुर में ही स्थापित कर दिये। सरगुजा में आज भी सिरकटी महामाया देवी की पूर्ति है। जिसमें प्रतिवर्ष मोम अथवा मिट्टी का सिर बनाया जाता है।
बस्तर दशहरा
दशहरा के अवसर पर बस्तर की आराध्य देवी दंतेश्वरी माई की रथ यात्रा निकालकर पूजा पाठ की जाती है। यहां 75 दिन तक दशहरा पर्व मनाया जाता है। सावन अमावस्या से आरंभ होकर क्वांर माह के 13 वें दिन तक दशहरा पर्व मनाया जाता है। बस्तर दशहरा पर्व का विशेष आकर्षण काष्ठ से बना विशाल रथ का नगर भ्रमण होता है जो 10 दिनों तक चलता है।
इतिहास- काकतीय वंश के प्रथम नरेश अन्नमदेव के समय से इस रथयात्रा की शुरूआत काकतीय नरेश पुरूषोत्तम देव ने किया था।
पाटनजात्रा- दंतेश्वरी मंदिर के समक्ष सिंहद्वार में गांव से रथ निर्माण के लिए गए काष्ठ की विधिवत पूजा की के बाद रथ निर्माण का कार्य आरंभ होता है।
डेरी गड़ाई- पाटाजात्रा के बाद भादों माह में 12 वें दिन डेरी गड़ाई की रस्म में सिरासार में जोगी बैठाने के लिए स्तंभ स्थापित किए जाते है। डेरी गढ़ाई के बाद 9 दिन तक नवा खाई का त्यौहार वर्जित माना है।
काछिन गादी – काछिन देवी मिरगान जाति की एक कुंवारी कन्या पर आती है। काछिन देवी फूल देकर दशहरा पर्व मनाने की अनुमति देती है। दंतेश्वरी मंदिर का पुजारी इस कार्यक्रम का अगुवाई करता है।
कलश स्थापना – आश्विन शुक्ल प्रथम दिन में दंतेश्वरी , मौली तथा कंकालीनमंदिर में कलश स्थापना की जाती है।
जोगी बिठाई – नवरात्रि के प्रथम दिन सिरासार में जोगी बिठाई की प्रथा मेंं जोगी परिवार का एक सदस्य लगातार 9 दिन जोगी बिठाई के समय पहले एक बकरे की बलि दी जाती थी पर अब केवल मांगुर मछ ली बलि के रूप में दिए जाते है।
रथ परिक्रमा- इसे फूलरथ भी कहते है। अश्विन माह की सप्तमी तक 6 दिनों रथ परिक्रमा करती है।
जनश्रुति- राजा पुरूषोत्तम देवी को श्री जगन्नाथ जी ने 12 पहियों वाले रथ का वरदान दिया था। इसलिए पहले 12 पहिए वाले रथ परिक्रमा करती थी, परंतु इसे चलाने में असुविधा होने के कारण इस रथ को 8 व 4 पहियों वाले दो रथों में विभाजित कर दिया जाता है।
रथ परिक्रमा में हल्बा सैनिकों में भूमिका महत्वपूर्ण है।
निशा जात्रा-अश्विन मास अष्टमी को निशा जात्रा की रस्म दिन देवी विशेष पूजा तथा हवन का विधान है।
जोगी बिठाई- अश्विन माह के नवमी को कुंवारी कन्याओं की पूजा,शाम के समय सिरासार में बैठाए गए जोगी समारोह पूर्वक उठाया जाता है।
नए कपड़े में चंदन का लेप लगाकर मावली माता की मूर्ति बना फूल से सजाई जाती है,मावली माता निमंत्रण पाकर दशहरा पर्व में सम्मिलित होने जगदलपुर पहुंचती है तब मावली देवी की डोली का स्वागत किया जाता है। राज परिवार के प्रमुख लोग नंगे पांव चलकर माई की डोली का स्वागत करते है।
रथ की चोरी- दशहरा की दिन जब रथ परिक्रमा पूरी करती है तब आदिवासी इस 8 पहिये वाले रथ को रात्रि में चुराकर मुम्हड़कोट ले जाते हैं। रथ चोरी प्रथा का नेतृत्व भतरा जाति के आदिवासी करते हैं। यहां वन भैंसे की बलि देने की प्रथा रही है। इसमें कान सिंगाया भैस का विशेष महत्व है। कालांतर में भैसे के स्थान पर बकरा और अब बकरे के स्थान पर रखिया काटकर बलि देने का विधान पूर्ण किया जाता है। कुम्हड़कोट में राजा देवी को नया अन्न अर्पित कर प्रसाद ग्रहण करते है।
द्य बाहर रैनी- दशहरे के दूसरे दिन बाहर रैनी का विधान में धनु कंडेया लोगो के केन्द्र बिन्दु होते हैं भतरा जाति के नवयुवक धनु कांडेया रथ खिंचने के लिए उत्सव की शोभा बढ़ाते है।
मुरिया दरबार- काछिन जात्रा के दिन शाम को 5 बजे सिरसार में ग्रामीण व शहरीमुखिया की एक मिली जुली आमसभा लगती है।
काछिन यात्रा – इसमें काछन देवी की पूजा अर्चना कर उसे संतुष्ट कर धन्यवाद दिया जाता है।
कुटुंब जात्रा – कुटुंब जात्रा में दशहरा में आमंत्रित सभी देवी देवताओं, ग्राम देवताओं तथा देवधामों की पूजा-अर्चना कर सम्मान पूर्वक विदाई दी जाती है।
गंगामुड़ा जात्रा – 13 वें दिन प्रात: गंगामुड़ा स्थित मावली शिविर के निकट बने मंडप पर माई के विदाई सम्मान में जात्रा संपन्न होता है। इस ओहाड़ी भी कहते है।बस्तर दशहरे का समापन होता है।
कंकाली मठ शस्त्र पूजन केवल दशहरे पर
राजधानी रायपुर के ब्राह्मणपारा में मां कंकाली का ऐतिहासिक मंदिर है। मंदिर में प्रतिष्ठापित 700 साल से अधिक पुरानी मां कंकाली की प्रतिमा पहले मंदिर से कुछ ही दूर स्थित कंकाली मठ में विराजित थी। नए मंदिर का निर्माण होने के पश्चात कंकाली माता की प्रतिमा को मठ से स्थानांतरित कर मंदिर में प्रतिष्ठापित किया गया लेकिन मठ में रखे प्राचीन अस्त्र-शस्त्रों को मठ के एक कमरे में ही रहने दिया गया। साल में एक बार दशहरा के दिन मठ को खोला जाता है अस्त्र-शस्त्रों की पूजा-अर्चना दर्शन करने भक्तों का तांता लगता है।
नागा साधु करते थे श्मशान में काली की आराधना
पं. मनोज शुक्ला की पुस्तक रायपुर का वैभव में उल्लेखित है कि 13वीं शताब्दी में दक्षिण भारत से यात्रा पर आए नागा साधुओं ने तांत्रिक साधना के लिए यहां डेरा डाला था। वर्तमान का ब्राह्मण पारा इलाका, जो कभी सुनसान जंगल हुआ करता था, साधुओं ने इस इलाके में मठ की स्थापना की थी समीप ही तालाब था जहां लोग कंकाल यानी अस्थियों का विसर्जन करने आते थे।
इसके चलते तालाब का नाम कंकाली तालाब पड़ गया। नागा साधुओं ने मठ में माता की मूर्ति स्थापित कर उसका नाम कंकाली मठ रखा। जब किसी नागा साधु की मृत्यु हो जाती तो उसी मठ में समाधि बना देते थे। आज भी नागा साधुओं की समाधियां मठ में हैं।
मठ के पहले महंत कृपालु गिरी
13वीं शताब्दी में मठ स्थापना के 400 साल बाद 17वीं शताब्दी में मठ के पहले महंत कृपालु गिरी हुए। इसके बाद भभूता गिरी, शंकर गिरी महंत बने। तीनों निहंग संन्यासी थे, लेकिन समय काल परिवर्तन के साथ महंत शंकर गिरी ने निहंग प्रथा को समाप्त कर शिष्य सोमार गिरी का विवाह कराया। उनकी संतान नहीं हुई तो शिष्य शंभू गिरी को महंत बनाया। शंभू गिरी के प्रपौत्र रामेश्वर गिरी के वंशज वर्तमान में कंकाली मठ के महंत एवं सर्वराकार हैं।
कोंडागांव-ग्राम बांसकोट
रावण पुतला दहन की मनाही
कोंडागांव जिले के बड़े राजपुर ब्लॉक के ग्राम बांसकोट में दशहरा पर रावण का पुतला दहन करने की मनाही है। मान्यता है कि यदि यहां पुतला दहन किया गया तो अनिष्ट की आशंका है। दशहरा पर्व पर रामलीला का आयोजन होता है, जहां एक रथ पर भगवान राम-लक्ष्मण और सीता पहुंचते हैं तथा श्रीराम और रावण की सेनाओं में युद्घ के पश्चात राम-रावण युद्घ होता है। अंत में भगवान श्रीराम द्वारा तीर चलाकर रावण का वध किया जाता है। पटाखे फोड़े जाते हैं, पर रावण दहन नहीं होता है।
रावण के रक्त का लगाते हैं तिलक
कोण्डागांव के एक अन्य गांव भुमका और हिर्री में भी लोग मिट्टी के रावण का पुतला बनाते हैं। इन दोनों गांव में रावन दहन नहीं किया जाता।  रामायण ग्रंथ में भगवान द्वारा रावण के वध का जिक्र है न कि दहन का। दशहरे के दिन यहा रामलीला के मंचन के दौरान राम बने कलाकार का तीर रावण के पुतले को लगता है। रावण के पुतले में नाभि के पास मटके में गुलाल का घोल भरा होता है। इसके फूटते ही ग्रामीण दौड़ पड़ते हैं, इसका तिलक लगाने को। ग्रामीणों में यह मान्यता है कि नाभि की वजह से रावण अमर था, इसे निकले गुलाल का तिलक उन्हें भी अच्छी सेहत देगा।
बालोद गुरुर गांव
सूट- बूट में रावण- बालोद जिले के गुरुर में रावण की एक ऐसी मूर्ति है जिसने सूट पहना हुआ है। गले में टाई और नीचे ट्राउजर है। पौराणिक मान्यताओं से उलट नजर आने वाली रावण की यह प्रतिमा 100 साल पुरानी है।
बालोद तर्री गांव के लोग यहां रावण दहन नहीं करते, बल्कि उसका पूजते हैं। रावण ज्ञानी, पंडित, चिकित्सक और संगीत प्रेमी थे। लोग रावण की मूर्ति से मन्नत भी मांगते हैं। पास ही भगवान राम का मंदिर है, यहां भी पूजा होती है।
कुंदरूपारा-कई गांवों में एक दिन पहले ही देव दशहरा
शहर के वार्ड कुंदरूपारा में एक दिन पहले ही देव दशहरा के साथ रावण का पुतला जला लिया गया। लगभग 40 साल से यहां के लोग इसी तरह से देव दशहरा मना रहे हैं। रात 10 बजे इसका दहन भी हुआ। कुंदरूपारा, लोग इस क्षेत्र को गांव की परंपरा का निर्वहन करते हैं। दुर्गा नवमी में गांव की तरह नवाखाई की परंपरा निभाते हैं।
द्य तीन देवियों का विसर्जन दशहरा के दिन- मोहल्ले में दुर्गा, काली और सरस्वती तीन देवियों की स्थापना नवरात्रि में जिसका विसर्जन विजयादशमी के दिन किया जाता है। देव दशहरा मनाए बगैर इनके विसर्जन का रिवाज यहां नहीं है।
द्य घुमका में भी देव दशहरा- ग्राम घुमका में भी देव दशहरा के तहत एक दिन पहले रावण का पुतला जलाया गया। रामलीला की प्रस्तुति सांस्कृतिक कार्यक्रम 25 साल से इसी तरह से आयोजन होता आ रहा है। आसपास के आठ गांवों में भी देव दशहरा जहां ग्रामीण हरदे लाल मंदिर में घोड़े की प्रतिमा चढ़ा बंजारी धाम मंदिर स्थल जुंगेरा में जोत जवारा विसर्जन के बाद देव दशहरा मनाया ।
धमतरी सोनामगर गांव – मिट्टी के अर्धनग्न रावण का वध
धमतरी के नगरी ब्लॉक के सोनामगर गांव में दशहरे के अगले दिन रावण वध की परंपरा है। यहां गीली मिट्?टी से अर्घनग्न रावण की प्रतिमा बनाई जाती है। इस वजह से इस कार्यक्रम में औरतों को शामिल होने की मनाही होती है। मिट्टी से बने रावण के पुतले को मां शीतला मंदिर की कटार ग्रामीण मिलकर वार कर टुकड़े किए जाते हैं। मिट्टी के टुकड़ों को इसे बाद घर लेकर जाते है, तब ही दशहरा पर्व पूर्ण माना जाता है।
देवभोग- लंकेश्वरी देवी का मंदिर
देवभोग में लंकेश्वरी देवी की परिक्रमा के बाद ही दशहरा मनाने की परंपरा है। पुरानी मान्यता के मुताबिक देवभोग इलाका खरदूषण राज वाले (रावण के भाई) का इलाका था जो दंडकारण्य क्षेत्र में स्थित था। लंकेश्वरी लंका की रक्षा करने वाली देवी मानी जाती थीं। हनुमान जी से युद्ध में हारकर उन्होंने यहां शरण ली थी। देवभोग के गांधी मैदान का दशहरा बहुत पुराना है। आज भी लंकेश्वरी की पूजा होती है। 1987 में देवभोग के गांधी चौक पर यह मंदिर बना। देवी मंदिर का पट साल में एक दिन दशहरे में खुलता है। इस दिन लंकेश्वरी देवी से रावण दहन की अनुमति ली जाती है।

जशपुर-मनौरा – नवरात्र में महिषासुर की होती है पूजा


ऐसी जनजाति है, जो इस दौरान गुस्से में और शोक में डूबा रहता है। ये लोग महिषासुर वध को छल बताते हैं। खुद को असुर राज का वंशज बताने वाले यह लोग नवरात्र पर महिषासुर मर्दिनी की नहीं, बल्कि महिषासुर की पूजा करते हैं। छत्तीसगढ़ में जशपुर जिले के मनौरा विकासखंड में पौराणिक पन्नों से निकलकर असुर आज भी निवासरत हैं। यह कहते हैं कि हम अपने पूर्वज की मृत्यु पर खुशी कैसे मना सकते हैं।
नवरात्र पर नहीं करते रीति-रिवाजों का पालन-खुद को राक्षसराज महिषासुर का वंशज बताने वाली जनजाति जशपुर के मनोरा विकासखंड के जरहापाठ, बुर्जुपाठ, हाडिकोन, दौनापठा स्थानों के अलावा बस्तर के कुछ हिस्सों मेें भी हैं। असुर समुदाय में भैंसासुर की पूजा दीपावली के दिन होती है। समाज के लोग दुर्गा पूजा में शामिल नहीं उन्हें डर रहता है कि देवी प्रकोप से उनकी मृत्यु हो सकती है। असुर जनजाति के लोग नवरात्रों के दौरान किसी भी तरह के रीति रिवाज या परंपरा का पालन नहीं करते हैं।
मुंगेली-लाठियों से पीटे जाते हैं रावण
मुंगेली में मिटटी से रावण का पुतला बनाया जाता है। दशहरा के दिन हर घर से एक सदस्य लाठी लेकर कार्यक्रम स्थल शहीद धनंजय सिंह राजपूत स्टेडियम में रंगारंग कार्यक्रम के बाद लाठियों से रावण पीटते हैं। लाठियों की चोट से पुतला के जमीन पर गिरे हुए टुकडों को लोग घर ले जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इन टुकडों से खुशहाली आती है। करीब 100 साल पहले यहां के मालगुजार परिवार ने इस परंपरा की शुरुआत की थी। जिले के कन्तेली गाँव में 16वीं सदी से दशहरे का मेला लगता है। आस-पास के 44 गाँव के लोग यहां पहुंचते हैं। राजा के बेटे गुनेंद्र सिंह यहां कुल देवी की पूजा करते हैं। रावण वध या पुतला दहन यहां भी नहीं होता।
ग्राम तार्री में एक ही स्थान पर राम रावण की प्रतिमा
ग्राम तार्री में एक ही स्थान पर भगवान राम के साथ रावण की प्रतिमा हैं। रावण प्रतिमा के पास श्रीराम जानकी मंदिर का निर्माण कराया है। लोग दोनों की पूजा करते हैं। मान्यता के अनुसार लोग यहां रावण की प्रतिमा के सामने मन्नत मांग पूरी होने पर प्रसाद चढ़ाते हैं।