रक्षा का महापर्व “रक्षाबंधन” कल 22 अगस्त को- इस साल पूरे दिन सजेंगी भाईयों की कलाई, भद्रा का साया नहीं


0 पं. मनोज शुक्ला

श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि के दिन रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है।
22 अगस्त रविवार को पड़ रहे इस बार रक्षाबंधन के लिए सबसे अच्‍छी बात यह है कि इस शुभ त्‍योहार पर भद्रा का साया नहीं है। इस बार भद्रा दोष से मुक्‍त रक्षाबंधन पूरे दिन भर मनाया जाएगा।

हमारी पुरातन संस्कृति के इतिहास मे रक्षाबंधन ऐसा त्योहार है। जिसकी महिमा विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद से लेकर पुराणो मे भरी पड़ी है। मूलतः राखी सौहार्द का सूचक तथा शुद्ध भावनाओ का पर्व है।

आपने कभी विचार किया है कि रक्षाबंधन क्यो मनाते है??

बस सीधा सा उत्तर जानते है कि भाई बहन का त्यौहार है। लेकिन ऐसा नही है।

रक्षाबंधन एक ऐसा बन्धन जिसमे हमे दुनिया के हर बुरे प्रभाव से बचाने की कामना रहती है। यह केवल भाई बहनों का त्यौहार मात्र होता तो लोग अपने घर के देवी देवताओं को , पेड़ पौधों को , अपने गाड़ी वाहन आदि को ,अपने घर के पालतू जानवरों को , अपने व्यापार व्यवसाय के क्षेत्र में तराजू , कलम व खाता बही में , कोई बहन अपने बच्चों को , कोई देश के सैनिकों को , कोई राजनेताओं को , कोई पुलिसकर्मियों को , कोई साधु संतों को भी रक्षाबंधन नही बांधते ।

उपरोक्त का तात्पर्य यह है कि जीवन मे बन्धन आवश्यक है किसी भी प्रकार के बन्धन में प्यार , दुलार , ममता , आशीर्वाद , कामना आदि का भाव होता है जिसके कारण हम एक पतले से धागे में मन – कर्म और वचन से बन्ध जाते है।
रक्षाबंधन एक दूसरे को मानसिक रूप से आश्वस्त करता है।

प्रमाण देख सकते है –

सबसे पहले वशिष्ठ जी ने चन्द्रभागा के तट पर अरुंधति को बांधा था। जो उनकी पत्नी थी। ( कालिका पुराण )

फिर देवराज इंद्र को उनकी पत्नी इंद्राणी ने, देवगुरु बृहस्पति के कहने पर बांधी थी।इसी तरह की रक्षा का आश्वासन भगवान कृष्ण द्वारा द्रौपदी को दिया गया था जब द्रौपदी ने अपने साड़ी का पल्लू फाड़ कर भगवान के उंगली में बांधी थी, इस तरह यह सूत्र रक्षा का आशीर्वाद देने वाला सूत्र तथा एक दूसरे को बन्धन में बांध कर कर्तव्यों को जिम्मेदारी से निभाने का संकल्प देता है । भारतीय जीवनशैली को चार वर्णो तथा आश्रमो मे बाँटा गया है। जिसके अनुसार ही चारों वर्णो के कार्य व पर्व बटे हुए है। जिस तरह दशहरा क्षत्रिय का तथा दीपावली वैश्य वर्णो का पर्व है उसी तरह-

रक्षाबंधन ब्राह्मणो का पर्व है इसलिए हर पूजन- अनुष्ठान मे ब्राह्मणो द्वारा सबसे पहले रक्षासुत्र बाँधी जाती है। परंपरागत आज भी रक्षाबंधन के दिन ब्राह्मण हर घर व दुकानों मे जाकर पूरे दिनभर अपने यजमानों को रक्षा सुत्र बाँधते है।

आत्मभाव से जुड़े होने के कारण लोग मंदिर मे भगवान को, अपने पालतू जानवरों, पेड़-पौधों, कलम-दवात , खिड़की-दरवाजा , कार – बाइक आदि तक मे भी बाँधते है। सामाजिक सुरक्षा व सहयोग के तारतम्य से स्कूल की लड़कियाँ अपने सहपाठी लडको तथा पड़ोस के व अपने भाई के दोस्तों को भी बाँधती है। इतिहास के कुछ घटनाओं ने प्राचीन इस रक्षा बंधन को नया रूप दे दिया। तब से यह पर्व भाई-बहन के स्नेह-सौहार्द का सूचक बन गया।

श्रावणी उपाकर्म-

भविष्य पुराण के अनुसार रक्षाबंधन के दिन गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, कावेरी, सरयू , क्षिप्रा आदि तीर्थ महानदियो मे स्नान , तर्पण व दान आदि करने से ब्रह्मा लोक की प्राप्ति होती है। तीर्थ स्थल मे न जा पाने की स्थिति मे अपने घर के पवित्र जल मे ही सारे तीर्थो का स्मरण कर पुण्य स्नान को भी पुण्यदायी बताया गया है।

हेमाद्रिकल्प” के अनुसार
पुण्य स्नान पश्चात धर्मनिष्ठ विद्वान ब्राह्मण-पुरोहित से स्वस्तिवाचन मंत्रोंच्चार युक्त रक्षासुत्र बंधवाना चाहिए । तथा श्रद्धा पूर्वक उनको भोजन करवाने के बाद दान करना चाहिए । मनुस्मृति व अनेक शास्त्रों मे श्रावण मास की पुर्णिमा को वैदिक कृत्य किये जाने का वर्णन है जिसे “श्रावणी उपाकर्म” कहते है। इसके अनुसार वेदधर्म निष्ठ ब्राह्मणो व अन्य यज्ञोपवीत धारियो को किसी श्रेष्ठ तीर्थ या पवित्र सरोवर मे जाकर वैदिक-पौराणिक पद्धति से उपाकर्म करना चाहिए ।

प्रभावशाली मंत्र :-

रक्षासूत्र बांधते समय आचार्य-पुरोहित, एक श्लोक का उच्चारण करते हैं, जिसमें रक्षाबन्धन का सम्बन्ध राजा बलि से स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। यह श्लोक रक्षाबंधन का अभीष्ट मंत्र है श्लोक में कहा गया है कि जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षाबन्धन से मैं तुम्हें बांधता हूं जो तुम्हारी रक्षा करेगा।

मन्त्र :- येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामनु बध्नामि रक्षेमाचल मा चल।

भगवान वामन व राजा बलि की कथा में रक्षाबंधन

जनमानस मे प्रचलित कथाओ के अनुसार राजा बलि द्वारा अपना सर्वस्व दान कर देने की दयालुता व भक्ति को देख भगवान वामन प्रसन्न हो गये। तथा उन्हें सुतल लोक का राजा बनाकर वरदान माँगने कहा। तो राजा बलि ने भगवान से कहा कि अपने राजमहल के चारो दरवाजे से जब भी आऊँ या जाऊँ तो आपका दर्शन हो।
इस तरह भगवान सुतल लोक मे राजा बलि के राजमहल मे ही रहने लगे।
सब स्थिति स्पष्ट होने पर चिंतित लक्ष्मी जी ने देवर्षि नारद जी के कथनानुसार सुतल लोक मे जाकर राजा बलि को राखी बाँधी तथा भगवान को वापस लेकर आयी ।

पौराणिक कथा-

पौराणिक कथाओं मे भी रक्षविधान का वर्णन है।- एक बार देवता-दानवो मे युद्ध छिड़ गया । बहुत समय तक युद्ध चला । जब देवता गण कमजोर होने लगे तब देवराज इन्द्र ने देवगुरू बृहस्पति से कुछ उपाय करने कहा। तब देवगुरू बृहस्पति ने श्रावण पूर्णिमा के दिन विधि विधान से रक्षाविधान का अनुष्ठान कर देवराज इन्द्र की धर्मपत्नी इन्द्राणी के द्वारा इन्द्र के दाहिने हाथ मे रक्षासुत्र बंधवाया था जिससे देवताओं को विजय प्राप्त हुआ ।

द्वापर युग की कथा-

द्वापर युग की प्रचलित कथा के अनुसार जब भगवान कृष्ण ने शिशुपाल का वध किया तो चक्र चलाने के उपक्रम मे भगवान के दाहिने हाथ की उंगली से रक्त निकलने लगा। तब द्रौपदी ने अपने पहनी हुई साडी की पल्लू को फाड़ कर भगवान के हाथों मे बाँधी जिससे रक्त बहना बंद हो गया। तब भगवान ने प्रेम से पुलकित होकर द्रौपदी को आशीर्वाद दिया कि तुम पर कोई भी विपत्ति नही आने दुँगा और हर प्रकार से तुम्हारी रक्षा करुँगा । जब कौरवो की सभा मे दुशासन ने जब द्रौपदी का चीरहरण करना चाहा तब भगवान ने रक्षा किया ।

आजादी के आंदोलन में भी कुछ ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जहाँ राखी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जनजागरण के लिए भी इस पर्व का सहारा लिया गया । रवीन्द्रनाथ टैगोर ने बंग-भंग का विरोध करते समय बंगाल निवासियों के पारस्परिक भाईचारे तथा एकता के प्रतीक रूप में रक्षाबंधन का त्यौहार मनाने की शुरुआत की थी ।

स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद के जीवन की एक मार्मिक घटना
रक्षाबंधन से जुड़ी है ।

आजाद एक बार तूफानी रात में शरण लेने हेतु एक विधवा के घर पहुँचे । पहले तो उसने उन्हें डाकू समझकर शरण देने से मना कर दिया, परंतु जब आजाद ने अपना परिचय दिया तब वह ससम्मान उन्हें घर के अंदर ले गयी । बातचीत के दौरान जब आजाद को पता चला कि उस विधवा को गरीबी के कारण जवान बेटी की शादी हेतु काफी परेशानियाँ उठानी पड़ रही हैं तो उन्होंने द्रवित होकर उससे कहा : ‘‘मेरी गिरफ्तारी पर 5,000 रुपये का ईनाम है, तु मुझे अंग्रेजों को पकड़वा दो और उस ईनाम से बेटी की शादी कर लो ।“ यह सुनकर विधवा रो पड़ी और बोली : ‘‘भैया ! तुम देश की आजादी के लिए अपनी जान हथेली पर रखकर चल रहे हो और न जाने कितनी बहू-बेटियों की इज्जत तुम्हारे भरोसे है । न मैं इतनी स्वार्थी हूँ और न ही गद्दार जो कि अपनी बेटी के लिए हजारों बेटियों का गला घोंट दूँ । मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकती। ”यह कहते हुए उसने एक रक्षासूत्र आजाद के हाथ में बाँधकर उनसे देश-सेवा का वचन लिया । रात बीती, सुबह जब उस विधवा की आँखें खुलीं तो आजाद जा चुके थे और तकिये के नीचे 5,000 रुपये रखे हुए थे । उसके साथ एक पर्ची पर लिखा था – ‘अपनी प्यारी बहन हेतु एक छोटी-सी भेंट’ – आजाद ।

रक्षाबंधन की वैज्ञानिकता-

वैज्ञानिक दृष्टि से भी दाहिने हाथ की कलाई मे बाँधे जाने वाले इस धागे का अलग ही महत्व है हमारे हाथ के रक्त वाहनियो का मुख्य संबंध सीधे हमारे हृदय से है। इसलिए हाथ मे बंधे हुए धागों के दबाव से रक्त का आवागमन हृदय तक एक समान बिना उतार चढ़ाव के बना रहता है।जिससे हृदयाघात जैसी बिमारियो से रक्षा होती है। इसके आलाव जिस व्यक्ति के द्वारा यह रक्षासुत्र बाँधा जाता है, उसके प्रति हमारे मन मे श्रद्धा व सम्मान बढ जाता है। किसी प्रकार की द्वेष भावना नही रहती ।